छत्तीसगढ़ी लोकगीतों में शांत रस

 

डाॅ एस के. ठाकुर1, डाॅ अभिनेष सुराना2, संगीता रंगारी3

1निर्देषक, खुबचंद बघेल, शा. स्नातकोत्तर महाविद्यालय, भिलाई - 3 (..)

2सहनिर्देषक, वी.वाय.टी. स्नातकोत्तर, महाविद्यालय, दुर्ग (..)

3शोधार्थी, सहायक प्राध्यापक (हिन्दी), वी.रा...लो. शासकीय कला, एवं वाणिज्य महाविद्यालय, रामाटोला जिला-राजनांदगाँव(

*Corresponding Author E-mail: rangarisangeeta@gmail.com

 

ABSTRACT:

प्रस्तुत शोध-पत्र में छत्तीसगढ़ी लोकगीत में शांत रस की व्याप्ति को अभिहित किया गया है। आज हम जिस भी अच्छी बुरी स्थिति में खड़े है, वह हमारे कर्मो का ही फल है। जीवन में सुख शांति एवं भटकाव से मुक्ति हमें भजन, ईष्वर की स्तुति के माध्यम से ही हासिल होती है। यानि जीवन में कुछ समय शांति की स्थापना के लिए ईष्वरीय भक्ति भजन कर मन शांत किया जा सकता है।

 

KEYWORDS: छत्तीसगढ़ी लोकगीतों, रस

 

 


प्रस्तावना

संगीता रंगारी

निर्वेद या सम शांत रस का स्थायी भाव है। Ÿाम प्रकृति के व्यक्तियों में इस रस का उद्रेक होता है।

षांत शमस्थायिभाव Ÿाम प्रकृति मर्तः।” 1

इसमें ईष्वरीय भक्ति एवं आत्मिक शांति की भावना प्रधान रूप से निहित होती है।

 

लोक भजन में शांत रस -

कबीर पंथियों में होने वाले चांैका गीत में गाय के गोबर से लिपने एवं स्वर्ण कलष को मोतियों से सुज्जित करने की परम्परा केवल छत्तीसगढ़ में ही नही बल्कि भारतीय लोकसाहित्य में भी है। इसी परम्परा से ओत-प्रोत चैंका गीत अद्योभाँति है-

गुरूजी को लावन परघाय के हो संतो भाई,

साहब आइन धर के तीर,

गुरूजी आवत-जावत सुन पाइतेव,

सोन के कलष जलाइतेंव 2

भक्ति भजन से जीवन की नैया सुगमता से पार लग जाती है। मन की शांति के लिए भजन श्रेयष्कर औषधि की भाँति कारगर साबित होता है-

प्राणी तर जाही रामा चोला तर जाही रामा

गा के भजन हरि के प्राणी तर जाही रामा

कासी घुमेंव मथुरा घुमेंव नइहें कहूं भलाई

मन हे चंगा कठौती मं गंगा हिरदे हरि समाई

मंदिर पूजे गिरजा पूजे मस्जिद अलख जगाई

अरजा जोरे सरधा टोरे रद्दा कहूं बनाई

धरमी रोवै पापी हांसे जरगे करम कमाई

एक आसा हे हरि भजन के जिनगी पार लगाई 3

ईष्वर की स्तुति से जीवन रूपी नैया को पार किया जा सकता है।

दुनिया की रीत निराली होती है। जीवन की सच्चाई तंबूरें के माध्यम से प्रकट होता है यह अभिव्यक्ति पारम्परिक भजन (देवगीत) दृष्टव्य है-

झन देख सुन झन बोल

मोरे बोले तंबूरा साहेब जी,

साँच बात महुरा कस लागे, गोठ लबारी आय

देख दूसर ला हांसन लागे, अपन दरि बगियाय

जांगर टोर कमइया मनखे भूखे लांघन सुति जाय

दूसर के जिनिस दूसर अपनेच मान लुटाय

मोर बोले तंबूरा

करनी बिन कथनील कहिथे मुरूख जे दिन रात

कुकुर असन वो भुंकन फिरथे सुनी सुनाई बात

जाने संदर मर्यादा ला नरवा के काहे बिसात

ज्ञानी के सब हांसी उड़ावे माने मुरूख के बात

मोर बोले तंबूरा

दिनमान जे हपटत रेंगे रात मं दउड़ लगाय

उजियारी मं संत के चोला रतिया मं मौज उड़ाय

सबके आघु दान धरम के बईठे बजार लगाय

लुटत खानी रहे एके झन कोन्हो जान पाय

मोर बोले तंबूरा

दूसर केबल मं अकड़त हे, अपन धाक जमाय

बेरा परे मं पाछू भागे सिधवा बइला बन जाय

आमा के रूख ला जेहा लगाये फल ओखर नई खाय

दुनिया के ये रीत अजब हे बिंदु दोष लगाय

मोर बोले तंबूरा 4

 

जस गीत में शांत रस -

प्राचीन काल से ही छत्तीसगढ़ी जनमानस मातृ शक्ति का उपासक रहा है। यही कारण है कि यहाँ का जनमानस अपने प्रदेष कोछत्तीसगढ़ महतारीकहकर ही संबोधन करता है। चाहे वह डोंगरगढ़ की माँ बम्लेष्वरी हो, चाहे रतनपुर की महामाया, चंन्द्रपुर की चन्द्रहासिनी हो चाहे बस्तर की दंतेष्वरी माई। ये सभी लोक देवियाॅ अनेक रूपों में यहाँ के जनमानस के लिए आस्था का प्रतीक है। नवरात्र में पूरे नौ दिनों तक माता की उपासना कर जस एवं जंवारा गीतों के माध्यम से सम्पूर्ण छत्तीसगढ़ भक्तिमय वातावरण से आलोकित होता है-

बाटे के तीर बाटे करेलिया, जामथे दुई-दुई पान हो मइया

नींदत कोडत मइया मै धन देखेंव, फुल टोरत रचिगे काया हो माय

झीनी रे कपडा पहिर कर माया, चले हे पदुमिया नारी हो माय

लुरकुट चेरिया संकट परगे माया मोर, मारत डंक कपारी हो माय 5

मोह माया के जाल में फंसे हुए व्यक्ति के लिए शांति की तलाष में ईष्वरीय भक्ति ही उसका एक मात्र सहारा होता है।

 

जसगीत मातृभक्ति रस से ओत-प्रोत लोकमानस के प्रति प्राकृतिक आस्था से आलोकित करते है। लोकसाहित्य का सदैव मुखरित रूप देखने मिलता है। इसी के अंतर्गत जंवारा लोकगीत (आरती) में देवी-देवताओं की स्तुति की जाती है। प्रकृति द्वारा प्रदŸ विभिन्न वस्तुओ को माता के चरणों में अर्पित किया जाता है। इस लोकगीत में तन को दीपक एवं मन को बाती स्वरूप मानकर प्रेमरूपी तेल डालकर स्वयं के साथ ही साथ जगत के कल्याण की भावना सन्निहित होते है-

 

आरती हो माय सवांगा ले ले

लेई लेबे हियर लगाय सवांगा ले

तन लागे दीया अउ मन लागे बाती

प्रेम के तेल जलाइके जरत हे सारी राती

होे सवांगा ले ले

आसन मार सिंगासन बइठे, लिम्बू लाट सदफल लटके

आती-पाती देवता बइठे मांझ मचोलना माता बइठे

चैंसठ जोगनी करे आरती लंगुरा चंवर डोलाय

हो सवांगा ले ले 6

यष का छत्तीसगढ़ी रूपांतरणजसहै। अर्थात देवी की महिमा का बखान कर गान करना है। जसगीत में देवी के शृंगार का वर्णन आत्मिक शांति को फलीभूत करता है -

मईया फुल गजरा, गूंथव हो मालिन

माई बर फुल गजरा

काहेन फुल के अजरा गजरा, काहेन फुल के हार

काहेन फुल के माथ मटुकिया, सोलह हो सिंगार

माई बर फुल गजरा

चम्पा फुल के अजरा गजरा चमेली फुल के हार

मोंगरा फुल के माथ मटुकिया, सोल हो सिंगार

माई बर फुल गजरा

कोन माई बर अजरा गजरा, कोन माई बर हार

कोन माई बर माथ मटुकिया, सोलह हो सिंगार

माई बर फुल गजरा

कोदईया माई बर अजरागजरा, धनैया माई बर हार

बुढ़ी माई बर माथ मटुकिया, सोलह हो सिंगार

                  माई बर फुल गजरा 7

जसगीत प्रकृति उपासना से अभिहित गीत है। उपरोक्त वर्णित गीत में कोदईया (कोदो) खाद्यान्न है। धनैया अर्थात धान। यहाँ लोकजन के लिए अन्न भी माँ के सदृष है।

 

प्रकृति उपासना के स्वर जसगीतों में अधिक मुखरित हुए है। जसगीत गायक बारहमासी गीतों में पूरे बारहमाह की महŸाा का वर्णन करते है जिसमे चिरषांति प्रदान करने वाला भाव होता है -

 

कातिक महिना धरम के हो माय

तुलसी दियना जलाय हो माय

अघ्घन महिना अगम के हो मोर माया

पुस हनत तुसार हो माय

माघ महिना धन अमुवा मउरे

फागुन उड़त हे गुलाल हो माया

चईत महिना धन रे सुवा फुले

बइसाख घाम जनाय हो माय

जेठ महिना लिख पतिया भेजेंव

आवत लग गे असाड़ हो माय

सावन महिना रिमरिस बरसे

भादों अहीर भइगे नम्मी दसेरा

धनु धजा पांडो सम्हार हो माय

चलत-फिरत मईया तोरे जस गायेंव 8

 

प्रकृति पूजा एवं मातृषक्ति की भक्ति से आप्लावित यह पर्व यहाँ के जनमानस के जिजीविषा का साक्षी स्वरूप है।

 

पंथी गीत में शांत रस -

पंथी गीत में आध्यात्मिक के भाव परिलक्षित होते है जिसमें शांत रस का निरूपण है-

 

सत्य में हे धरती, सत्य में आकाष हो,

सत्य में चंदा, अरू सत्य में सुरूज हो,

सत्य में तर जाही संसार, किथे गुरू हा हमार,

अमरित धार बोहाई दे,

होई जाही बेड़ा पार,

सतगुरू महिमा बताई दे। 9

प्रकृति के शाष्वत सत्य का चित्रण किया गया है कि संसार का कल्याण सत्य के कारण ही है।

 

 

 

 

शोध प्रविधि -

प्रस्तुत शोध पत्र में सर्वेक्षण पद्धति का प्रयोग किया गया है एवं पुस्तकालयीन पद्धति का भी प्रयोग किया गया।

 

शोध का उद्देष्य -

छत्तीसगढ़ी लोकसाहित्य पर  विहंगम दृष्टि डालते हुए छत्तीसगढ़ी लोकगीत में शांत रस की व्याप्ति का अध्ययन करना।

 

निष्कर्ष -

सेवा की राह इतनी आसान नहीं होती है। स्वयं को सेवक या दास बनाने का भाव और उस भाव के अनुरूप जीना किसी साधना से कम नही है। अपनी इच्छाओं, अपेक्षाओं और आकांक्षाओं से दूर रहकर निःस्वार्थ भाव से सेवा करना किसी अग्नि परीक्षा से कम नही है। ईष्वरीय भक्ति साधना में भी व्यक्ति जब रम जाता है तब वह बाह्य स्वरूप से आकर्षित नही होता है। ऐसे भाव से व्यक्ति पथिक बन जाता है तो उसे स्वयमेव सुख, शान्ति, आत्मिक अनुभूति, आह्लाद परस्पर मिल ही जाता है। जो समय बीत गया वह यदि पीडा, दुख देने वाला एवं असंतोषजनक रहा हो, फिर भी इतनी गुंजाइष अभी बाकी है हाथ में जो कुछ बचा खुचा है यदि उसे संभालकर रखा जाय एवं उसका सही तरीके से उपयोग किया जाए जिससे बिगड़ा हुआ भी सुधर जाये। यानि जीवन में कुछ समय शांति की स्थापना के लिए ईष्वरीय भक्ति भजन कर मन शांत किया जा सकता है।

 

छत्तीसगढ़ी जनमानस शांन्ति एवं सादगी पसंद जनमानस है। यही शांति एवं सादगी यहाँ के लोकगीतों में परिलक्षित है।

 

संदर्भ सूची -

1.      साहित्य दर्पण: विष्वनाथ: 3/245.

2.      पाठक डाॅ विनय कुमार, संकल्परथ अक्टूबर 1997, कबीर पंथी छत्तीसगढ़ी लोक भजन पृष्ठ संख्या 25.

3.      सूचक - यादव पीसी लाल.

4.      हर्ष कुमार बिन्दु जमात पारा राजनांदगाँव छत्तीसगढ़ से संकलित.

5.      यादव पीसी लाल, छत्तीसगढ़ी लोकगीत विविध आयाम, रायपुरःसर्वप्रिय प्रकाषन पृष्ठ संख्या 45.

6.      -वही- पृष्ठ संख्या 52.

7.      निजी संग्रह.

8.      रेडियों संकलन.

9.      सोनी जे.आर. पंथी गीत एवं राष्ट्रीय चेतना, रायपुर वैभव प्रकाषन पृष्ठ संख्या 21.

 

 

 

 

 

Received on 30.04.2019            Modified on 14.05.2019

Accepted on 27.05.2019            © A&V Publications All right reserved

Int. J. Rev. and Res. Social Sci. 2019; 7(2):441-443.